75 प्रतिशत आरक्षण को लेकर पटना हाई कोर्ट में दी गई चुनौती

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बिहार सरकार द्वारा जातीय सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 75 प्रतिशत आरक्षण लागु किया गया है। राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद इसे राज्य में लागु कर दिया गया है लेकिन अब इस 75 प्रतिशत आरक्षण वाले निर्णय को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।

बिहार के जातीय सर्वे की रिपोर्ट को विधानमंडल में पेश किया गया जिसके अनुसार आरक्षण को 60 प्रतिशत से बढाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया। 10 नवम्बर को विधानमंडल में बिल पास करने के बाद 18 नवम्बर को राज्यपाल के पास भेज दिया गया। राज्यपाल के सहमती के बाद 21 नवम्बर को इसे बिहार में सरकारी नौकरियों और दाखिलों के लिए लागु कर दिया गया। आरक्षण में इस नए बदलाव के कारण बिहार में बहस चल ही रही थी कि अब इसे पटना हाई कोर्ट में भी चुनौती दे दी गई है। सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने मामले को लेकर कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी है।

75 प्रतिशत

याचिकाकर्ताओं ने कहा यह संविधान के खिलाफ है

सोसाइटी के सदस्यों के मुताबिक आरक्षण को लेकर जो नियम है वो तर्कसंगत नहीं है और यह संविधान के नियमों का उल्लंघन करता है। उनके अनुसार जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण को बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं है। । याचिकाकर्ताओं ने इन अधिनियमों पर रोक लगाने की भी मांग की है।

60 से 75 प्रतिशत बढ़ा आरक्षण

नये आरक्षण के नियमों में अत्यंत पिछड़ा वर्ग, सूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण को मौजूदा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं EWS कोटा में कोई बदलाव न करते हुए यथावत 10 प्रतिशत रखा गया है, जिसके चलते आरक्षण का यह दायरा 50 प्रतिशत से बढ़कर 75 प्रतिशत तक पहुँच गया है।

आरक्षण में बदलाव का कारण

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दोनों सदनों में आरक्षण के दायरे को बढ़ाने के पीछे का कारण बताया था। उन्होंने कहा था कि जातीय सर्वे में हर वर्ग और जाति के लोगों के आर्थिक स्थिति पता की गई थी जिसके अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आबादी के 100 प्रतिशत के हिसाब से 22 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा। इसमें EWS का 10 प्रतिशत आरक्षण यथावत रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है यह मामला

नये आरक्षण संशोधन विधेयक को सुप्रीम कोर्ट से भी खतरा है। बिहार में लागू हुए इस नए आरक्षण संशोधन विधेयक को कानूनी स्तर पर शायद यह पहली चुनौती नहीं होगी। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी जा सकता है। अगर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो कोर्ट इसके लाभ और हानि की नई स्तर से समीक्षा करेगा।

अगर इसमें यह सही साबित हुआ तो यह लागू रह सकता है अन्यथा नीतीश सरकार को इसे वापस लेना भी पड़ सकता है और अगर ऐसा होता है तो यह पहली बार नहीं होगा जब किसी राज्य सरकार ने किसी विशेष जाति या वर्ग को अतिरिक्त आरक्षण देने का कदम उठाया हो और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलने के बाद कोर्ट ने उसकी समीक्षा करते हुए उसे असंवैधानिक करार दिया हो और उसे सरकार को वापस भी लेना पड़ा हो। हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने ओ.बी.सी आरक्षण को 17 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का निर्णय लिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर सरकार को नोटिस जारी कर दिया था।

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